यत् कारुण्यमगण्यमेव सुसुखं नास्त्येव यस्मात् परं - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (11.109)

यत् कारुण्यमगण्यमेव सुसुखं नास्त्येव यस्मात् परं - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (11.109)

यत् कारुण्यमगण्यमेव सुसुखं नास्त्येव यस्मात् परं
निर्मर्याद विचित्र शक्ति सहजा खेलञ्च वृन्दावनम्।
तद्राधा करुणाकटाक्ष रहिते किंचितकरं नैव तद्
दृष्टान्तोऽहमबोधमात्र विरहात्तीव्रात्तिभारः स्थितः।।

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (11.109)

जिसकी करुणा अनन्त है, जिससे अधिक और सुख कहीं भी नहीं प्राप्त हो सकता, यह श्रीवृन्दावन जिनका असीम विचित्र शक्ति-युक्त क्रीड़ा-उद्यान है, उस श्रीराधा का करुणा कटाक्ष न होने पर जो कुछ और समस्त है वह अत्यन्त तुच्छ है, दृष्टांततः मैं भी अज्ञानता के आधीन होकर जब ‘मेरे प्रति श्रीराधा की कृपा नहीं है’ ऐसा मन में सोचता हूँ तो तीव्र आर्त्त हो कर व्याकुल हो उठता हूँ।।