नमो नमो श्री बृंदावनचंद - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (34)

नमो नमो श्री बृंदावनचंद - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (34)

(राग गौर)
नमो नमो श्री बृंदावनचंद ।
नित्य अनंत अनादि एकरस पिय प्यारी बिहरत स्वच्छंद ।। [1]
सत्त चित्त आनंद रूपमय खग, द्रुम, बेली बृंद ।
भगवतरसिक निरंतर सेबत मधुप भये पीवत मकरंद ।। [2]

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (34)

अद्भुत सौंदर्य की छटा बिखेरने वाले श्री धाम वृंदावन को हमारा बारंबार प्रणाम है । यह (वृंदावन) नित्य अनादि और अनंत है यहां श्री प्रिया प्रियतम एकरस स्वच्छंद विहार करते रहते हैं । [1]

यहांके खग, मृग, वृक्ष और लताओं के सुंदर समूह - सभी नित्य, चैतन्य और आनंदस्वरूप हैं । भगवत रसिक जी कहते हैं कि (श्रीप्रियाप्रियतम और सहचरियाँ) निरंतर इस वृंदावन का सेवन करते रहते हैं ।  [2]