मोहिं स्वामिनि! अपनी मान रे।
तुम्हरे चरण कमल कहँ ध्यावत, गावत नित गुनगान रे ॥ [1]
भुक्ति मुक्ति नहिं माँगति स्वामिनि, माँगति यह वरदान रे ।
करौं टहल बनि महल टहलिनी, उर न कामना आन रे ॥ [2]
देउँ बुहारी पलकनि महलनि, लेउँ कबहुँ पिकदान रे ।
खाय ‘कृपालु’ जाउँ बलि कबहुँक, जूठन मुख के पान रे ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा माधुरी (32)
हे किशोरी जी! मुझे अपनी दासी बना लीजिए। हम केवल तुम्हारे चरण–कमलों का ध्यान करते हैं एवं तुम्हारे ही गुणों को गाते हैं। [1]
हम भुक्ति मुक्ति आदि कुछ नहीं माँगते। हे स्वामिनी जी! हम तो एक ही वरदान माँगते हैं कि तुम्हारे महल की दासी बनकर नित्य दासता करती रहूँ, अन्य कोई भी कामना नहीं है। [2]
अपनी आँखों की पलकों से महल में बुहारी लगाया करूँ। कभी पीकदान लिये रहूँ। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि क्या कभी ऐसा भी दिन होगा जब तुम्हारे मुख के जूठे पान खा कर बलिहार जाऊँगा। [3]
तुम्हरे चरण कमल कहँ ध्यावत, गावत नित गुनगान रे ॥ [1]
भुक्ति मुक्ति नहिं माँगति स्वामिनि, माँगति यह वरदान रे ।
करौं टहल बनि महल टहलिनी, उर न कामना आन रे ॥ [2]
देउँ बुहारी पलकनि महलनि, लेउँ कबहुँ पिकदान रे ।
खाय ‘कृपालु’ जाउँ बलि कबहुँक, जूठन मुख के पान रे ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा माधुरी (32)
हे किशोरी जी! मुझे अपनी दासी बना लीजिए। हम केवल तुम्हारे चरण–कमलों का ध्यान करते हैं एवं तुम्हारे ही गुणों को गाते हैं। [1]
हम भुक्ति मुक्ति आदि कुछ नहीं माँगते। हे स्वामिनी जी! हम तो एक ही वरदान माँगते हैं कि तुम्हारे महल की दासी बनकर नित्य दासता करती रहूँ, अन्य कोई भी कामना नहीं है। [2]
अपनी आँखों की पलकों से महल में बुहारी लगाया करूँ। कभी पीकदान लिये रहूँ। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि क्या कभी ऐसा भी दिन होगा जब तुम्हारे मुख के जूठे पान खा कर बलिहार जाऊँगा। [3]

