(राग ललित)
हमरो प्रणाम बांके बिहारी को ।
मोर मुकुट माथे तिलक बिराजै, कुंडल अलकाकारी को ॥ [1]
अधर मधुर पर बंशी बजावै, रीझ रिझावै राधाप्यारी को ।
यह छबि देख मगन भई मीराँ, मोहन गिरवरधारी को ॥ [2]
- श्री मीराबाई जी
(यह पद श्री मीराबाई जी ने तब लिखा था जब उन्होंने श्री बांके बिहारी जी के वृंदावन में दर्शन किए थे।)
इस पद् में श्री मीराबाई जी ने श्री बांके बिहारी जी को प्रणाम एवं उनके मधुर रूप का वर्णन किया है। श्री बांके बिहारी जी के सिर पर मोर मुकुट एवं माथे पर तिलक विराजता है, उन्होंने कुंडल और काली अलकावली धारण कर रखी है । [1]
श्री बिहारीजी ने होंठों में मुरली धारण कर रखी है, जो मधुर धुन से श्री राधा प्यारी को नित्य "राधा" नाम से रिझाती है। श्री बांके बिहारी नित्य श्री राधारानी को ही रिझाते रहते हैं। श्री मीराबाई जी कहती हैं कि "श्री मोहन गिरधारी कि इस मधुर छबि को देखकर मीराबाई मग्न हो उठीं" । [2]
हमरो प्रणाम बांके बिहारी को ।
मोर मुकुट माथे तिलक बिराजै, कुंडल अलकाकारी को ॥ [1]
अधर मधुर पर बंशी बजावै, रीझ रिझावै राधाप्यारी को ।
यह छबि देख मगन भई मीराँ, मोहन गिरवरधारी को ॥ [2]
- श्री मीराबाई जी
(यह पद श्री मीराबाई जी ने तब लिखा था जब उन्होंने श्री बांके बिहारी जी के वृंदावन में दर्शन किए थे।)
इस पद् में श्री मीराबाई जी ने श्री बांके बिहारी जी को प्रणाम एवं उनके मधुर रूप का वर्णन किया है। श्री बांके बिहारी जी के सिर पर मोर मुकुट एवं माथे पर तिलक विराजता है, उन्होंने कुंडल और काली अलकावली धारण कर रखी है । [1]
श्री बिहारीजी ने होंठों में मुरली धारण कर रखी है, जो मधुर धुन से श्री राधा प्यारी को नित्य "राधा" नाम से रिझाती है। श्री बांके बिहारी नित्य श्री राधारानी को ही रिझाते रहते हैं। श्री मीराबाई जी कहती हैं कि "श्री मोहन गिरधारी कि इस मधुर छबि को देखकर मीराबाई मग्न हो उठीं" । [2]

