संसार समुद्र मनुष्य मीन - श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (09)

संसार समुद्र मनुष्य मीन - श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (09)

(राग आसावरी)
संसार समुद्र मनुष्य मीन नक्र मगर और जीब बहु बंदसि। [1]
मन बयार प्रेरे स्नेह फंद फंदसि॥ [2]
लोभ पिंजरा लोभी मरजिया पदारथ चारि खंद खंदसि। [3]
कहि श्री हरिदास तेई जीव पार भये जे गहि रहे चरन आनन्द नन्दसि॥ [4]

- ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (9)

यह संसार एक अथाह सागर के समान है, जिसमें यह मनुष्य-रूपी मीन (मछली) काल के क्रूर घड़ियालों और मगरमच्छों जैसे हिंसक विषयों से घिरी हुई है, जो उसे प्रतिपल निगलने के लिए तत्पर रहते हैं। [1]

जीव का चंचल चित्त वायु के वेग की भाँति अस्थिर है, जो मोह-रूपी पाश में आबद्ध होकर निरंतर इधर-उधर भटकता रहता है। [2]

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चार पदार्थों की लालसा में वह लोभी जीव लोभ-रूपी पिंजरे में फँसता चला जाता है। [3]

स्वामी हरिदासजी कहते हैं कि केवल वही जीव इस संसार-सागर से पार हो सकता है जिन्होंने परमानन्द स्वरूप श्रीबाँकेबिहारीजी महाराज के चरणों का सच्चा आश्रय ले लिया है। [4]