सोभा-सिंधु निधिवन और - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (6.8)

सोभा-सिंधु निधिवन और - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (6.8)

सोभा-सिंधु निधिवन और ।
निरखी नख सिख माधुरी मंजुल महल की पौर ॥
करत सब रस बारता बाँके रसिक सिरमौर ।
भाँवती भगवत रसिक लीने भुजन भरि दौर ॥

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (6.8)

यह निधिवन किसी विलक्षण शोभा का महा सागर है । यहां निकुंज भवन की मंजुल पौड़ी में ही ऊपर से नीचे तक ऐसी अद्भुत माधुरी छाई हुई है कि उसे देखकर बाँके रसिक शिरोमणि श्यामा कुंजबिहारी यहीं रसमयी वार्ता (रस विहार) संपन्न करने लगे हैं ।
भगवत रसिक जी कहते हैं कि प्यारी सखी श्री ललिता जी ने तभी दौड़ कर उन्हें भुजाओं में भर लिया (और निकुंज भवन के भीतर के भीतर सेज पर ले गई) ।