प्यार ही की कुंज और प्यार ही की सेज रची - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, आनंद दशा विनोद (44)

प्यार ही की कुंज और प्यार ही की सेज रची - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, आनंद दशा विनोद (44)

(कवित्त)
प्यार ही की कुंज और प्यार ही की सेज रची ,
प्यार ही सौं प्यारे लाल प्यारी बात करहीं। [1]
प्यार ही की चितवनि मुसिकनि प्यार ही की,
प्यार ही सौं प्यारी जू कौं प्यारौ अंक धरहीं॥ [2]
प्यार सौं लटकी रहैं प्यार ही सौं मुख चहैं,
प्यार ही सौं प्यारौ प्रिया अंक भुज भरहीं। [3]
'हित ध्रुव' प्यार भरी प्यारी सखी देखै खरी,
प्यारै-प्यार रह्यो छाई, प्यार-रस ढरहीं॥ [4]

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, आनंद दशा विनोद (44)

प्रेम-निर्मित कुंज भवन में प्यार की एक शय्या रची है, जिस पर प्यार के साथ विराजित प्यारे प्रियतम लाल जी अपनी प्यारी प्रिया से प्रेम-प्यार की वार्ताएँ करते रहते हैं। [1]

युगल की चितवन प्यार की है और मुस्कान भी प्यार की है। प्रेम-प्यार से उल्लासित प्रियतम अपनी प्यारी को अपने अंक में समेटे हुए हैं। [2]

वे कभी प्रेम-प्यार की लटकन से लटक जाते हैं और कभी प्यारपूर्वक परस्पर एक-दूसरे का मुखावलोकन करते रहते हैं। तब प्यार से उमगती हुई प्यारी प्रिया प्रियतम को अपनी भुजाओं से लपेट कर अंकवार में भर लेती हैं। [3]

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि युगल के इस प्यार भरे लीला-खेलन दृश्य को प्यार भरी सखियाँ अपनी सुध-बुध खोकर खड़ी देखती रहती हैं और प्रेम-प्यार के रस में प्रवाहित होती रहती हैं। [4]