आनंदकन्देऽपि न विंदते मनो वृन्दावने सुंदरि सौख्य बिंदुकम्।
मनागवीक्ष्य स्मितचारु ते मुखं विना क्व चंद्र कुमुदं मुदं व्रजेत्।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (11.110)
हे सुंदरी राधे! तुम्हारे मृदु मधुर मुस्कानयुक्त मुख को क्षणमात्र न देखने पर यह आनंद कंद श्रीवृन्दावन भी बिंदुमात्र सुख का अनुभव नहीं कर पाता, चंद्र के बिना क्या कहीं कुसुम आनंद को प्राप्त कर सकता है?
मनागवीक्ष्य स्मितचारु ते मुखं विना क्व चंद्र कुमुदं मुदं व्रजेत्।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (11.110)
हे सुंदरी राधे! तुम्हारे मृदु मधुर मुस्कानयुक्त मुख को क्षणमात्र न देखने पर यह आनंद कंद श्रीवृन्दावन भी बिंदुमात्र सुख का अनुभव नहीं कर पाता, चंद्र के बिना क्या कहीं कुसुम आनंद को प्राप्त कर सकता है?

