धन्य धन्य लड़ैती मेरी है।
अपनी जानि बिहारिनि रानी कृपा दृष्टि करि हेरी है।
छिन छिन प्रीति करत अलबेली सदाई रहत सु नेरी है।
श्री हरिदासी रसिक सिरोमनि तन मन इन्हीं केरी है।
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (109)
मेरी प्राण प्यारी श्री राधा रानी मेरी हैं। श्री राधा रानी के रूप में जीवन धन पाकर मैं धन्य हो गया हूँ । श्री बिहारिनि रानी ने मुझे अपनी जान कर मेरे ऊपर कृपा दृष्टि डाली है। यह ऐसी अलबेली सरकार है जो हर क्षण अपने जन पर अपना प्रेम लुटाती हैं, और सदा उनके समीप ही रहती हैं।
अपनी जानि बिहारिनि रानी कृपा दृष्टि करि हेरी है।
छिन छिन प्रीति करत अलबेली सदाई रहत सु नेरी है।
श्री हरिदासी रसिक सिरोमनि तन मन इन्हीं केरी है।
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (109)
मेरी प्राण प्यारी श्री राधा रानी मेरी हैं। श्री राधा रानी के रूप में जीवन धन पाकर मैं धन्य हो गया हूँ । श्री बिहारिनि रानी ने मुझे अपनी जान कर मेरे ऊपर कृपा दृष्टि डाली है। यह ऐसी अलबेली सरकार है जो हर क्षण अपने जन पर अपना प्रेम लुटाती हैं, और सदा उनके समीप ही रहती हैं।
श्री ललित किशोरीजी कहते हैं कि श्री हरिदासी (ललिता सखी) जो रसिक शिरोमणि हैं उन्होंने श्री लाडिली जू पर और श्री लाडिली जू ने इन पर अपना तन मन लुटा रखा है।

