वैर करै हरिभक्तसौं, मित्र करै संसार।
भक्त कहावै आपते, मिटै न जमकौ द्वार॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (140)
जो संसार से मित्रता करे और भक्तों से वैर रखे, फिर भी अपने को भक्त कहलाए—उसका यमराज के द्वार पर आवागमन कभी समाप्त नहीं होगा।
भक्त कहावै आपते, मिटै न जमकौ द्वार॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (140)
जो संसार से मित्रता करे और भक्तों से वैर रखे, फिर भी अपने को भक्त कहलाए—उसका यमराज के द्वार पर आवागमन कभी समाप्त नहीं होगा।

