चलो मन ! श्री वृंदावन धाम - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, धाम-माधुरी (01)

चलो मन ! श्री वृंदावन धाम - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, धाम-माधुरी (01)

चलो मन ! श्री वृंदावन धाम ।
जहँ विहरत नागरि अरु नागर,कुंजनि आठों याम ।
भूख लगे तो रसिकन जूठनि, खाइ लहिय विश्राम ।
प्यास लगे तो तरणि-तनुजा,तट पिवु सलिल ललाम ।
नींद लगे तो जाइ सोइ रहु, लतन-कुंज अभिराम ।
ब्रज की रेनु रेनु लखि चिन्मय,तन्मय रहु अविराम ।
पै "कृपालु" मन ! जनि यह भूलिय, भाव रहे निष्काम ।

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज,प्रेम रस मदिरा, धाम माधुरी (01)

 हे मन ! तू दिव्य चिन्मय वृन्दावन-धाम में चल, ज़हाँ लाडिली और लाल विविध कुंजों में आठों याम विहार किया करते हैं। यदि तुझे भूख लगे तो रसिक महापुरुषों की झूठन खाकर सुखी होना । जब प्यास लगे, यमुना का निर्मल जल पी लिया करना। जब सोने की इच्छा हो तब स्वाभाविक बने हुए लताओं के कुंज घरों में सो जाया करना। अरे मन ! ब्रज के प्रत्येक कण-कण में चिन्मय-स्वरुप देखते हुए सदा ही तन्मय रहा करना। "श्री कृपालु जी" कहते हैं कि हे मन ! किन्तु यह न भूलना की इन सब में तेरा भाव निष्काम ही रहे ।