जो तुम पुरवहौ मन काम - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (45)

जो तुम पुरवहौ मन काम - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (45)

(दोहा)
रहों टहलनी महल में, होइ अहो निसि जाम ।
मैं माँगत हों यह सदा, जो तुम पुरवहु काम ॥


(पद)
जो तुम पुरवहौ मन काम ।
तो मैं माँगत यही निसि दिन छिन न बिसरों नाम ।।
रहौं टहलनी महल में व्है निरखि छबि अभिराम ।
श्रीहरिप्रिया हित बात सुनी सुनी धरौं निज हिय धाम ।।

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (45)

।। दोहा ।।
अहो निशायम्—अर्थात् रात और दिन हर समय। श्रीलालजू पुनः निवेदन करने लगे—"हे प्रियाजी! यदि आप मेरी अभिलाषाओं को पूर्ण करना चाहें, तो मैं दीनभाव से यही याचना करता हूँ कि मैं आपके निज महल की एक टहलनी (परिचारिका) बनकर अहर्निश आपकी सेवा में रत रहूँ।"

।। पद ।।
जो आप मेरी मन की अभिलाषाओं को पूर्ण कर दें तो मैं यह मांगता हूं की रात दिन आपके नाम को क्षण काल के लिए भी ना बिसारूँ और आपके महल की टहलनि होकर आपकी रूप माधुरी को निहारता रहूँ । जो आप श्री हरिप्रिया सखी से प्रेम की बातें करें उन्हें मैं सुनूं और चुन-चुन कर ह्रदय में धारण करता रहूं ।