धन्यो लोके मुमुक्षुर्हरिभजनपरो धन्यधन्यस्ततोऽसौ
धन्यो यः कृष्णपादाम्बुजरतिपरमो रुक्मिणीशप्रियोऽतः ।
याशोदेयप्रियोऽतः सुबलसुहृदतो गोपकान्ताप्रियोऽतः
श्रीमद्वृन्दावनेश्वर्यतिरसविवशाराधकः सर्वमूर्ध्नि ॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (2.34)
इस पृथ्वी पर जो मुमुक्षु हैं, वे धन्य हैं । जो हरि भजन परायण हैं, वे धन्य धन्य हैं । उन से उत्कृष्ट वे हैं जो श्री-कृष्ण के चरणकमलों मे परमासक्त हैं । उन से अधिक रुक्मिणी वल्लभ श्री-कृष्ण के भक्त हैं । उन से श्रीयशोदानन्दन श्री-कृष्ण के भक्त वृन्द अधिक प्रशंसनीय हैं । उन से अधिक धन्य सुबल सखा श्री-कृष्ण के प्रिय गण हैं । उन से अधिक गोपीजन धन्य हैं, श्री-कृष्ण की प्रीति परायण हैं । किंतु वृन्दावनेश्वरी श्री राधारानी के आराधक (एवं श्री राधा के रस वशीभूत विवश श्री कृष्ण और राधा युगल के आराधक) सब के मुकुट मणि हैं ।
धन्यो यः कृष्णपादाम्बुजरतिपरमो रुक्मिणीशप्रियोऽतः ।
याशोदेयप्रियोऽतः सुबलसुहृदतो गोपकान्ताप्रियोऽतः
श्रीमद्वृन्दावनेश्वर्यतिरसविवशाराधकः सर्वमूर्ध्नि ॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (2.34)
इस पृथ्वी पर जो मुमुक्षु हैं, वे धन्य हैं । जो हरि भजन परायण हैं, वे धन्य धन्य हैं । उन से उत्कृष्ट वे हैं जो श्री-कृष्ण के चरणकमलों मे परमासक्त हैं । उन से अधिक रुक्मिणी वल्लभ श्री-कृष्ण के भक्त हैं । उन से श्रीयशोदानन्दन श्री-कृष्ण के भक्त वृन्द अधिक प्रशंसनीय हैं । उन से अधिक धन्य सुबल सखा श्री-कृष्ण के प्रिय गण हैं । उन से अधिक गोपीजन धन्य हैं, श्री-कृष्ण की प्रीति परायण हैं । किंतु वृन्दावनेश्वरी श्री राधारानी के आराधक (एवं श्री राधा के रस वशीभूत विवश श्री कृष्ण और राधा युगल के आराधक) सब के मुकुट मणि हैं ।

