(राग आसावरी)
मन लगाय प्रीति कीजै, कर करवा सौं ब्रज-बीथिन दीजै सोहनी। [1]
मन लगाय प्रीति कीजै, कर करवा सौं ब्रज-बीथिन दीजै सोहनी। [1]
वृन्दावन सौं, बन-उपवन सौं, गुंज-माल हाथ पोहनी॥ [2]
गो गो-सुतनि सौं, मृगी मृग-सुतनि सौं, और तन नैंकु न जोहनी। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी सौं चित, ज्यौं सिर पर दोहनी॥ [4]
गो गो-सुतनि सौं, मृगी मृग-सुतनि सौं, और तन नैंकु न जोहनी। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी सौं चित, ज्यौं सिर पर दोहनी॥ [4]
- ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (12)
स्वामी श्रीहरिदासजी नित्य-विहार के उपासकों को यह आज्ञा देते हैं कि अपने मन को एकाग्र कर श्रीश्यामा-कुंजबिहारी से प्रेम करो। ब्रज की रज-निर्मित करुवा से स्नेह करो, और प्रतिदिन ब्रज की पावन गलियों में बुहारी देते रहो। [1]
श्रीधाम वृंदावन के बारह वन और बारह उपवनों सहित ब्रजमंडल के उन समस्त स्थलों का श्रद्धापूर्वक सेवन करो, जहाँ श्रीकृष्ण ने दिव्य विहार किया है। इन कुंजों से वन्य-पुष्प और गुञ्जा-फलों का चयन कर प्रिया-लाल (श्रीराधा-कृष्ण) के लिए अत्यंत प्रेमपूर्ण मालाएँ गुंफित करो और उन्हें अर्पित करो। [2]
गायों और मृगियों की स्नेह-भरी दृष्टि अपने बच्चों पर केंद्रित रहती है, वे अन्य बच्चों की ओर ध्यान नहीं देतीं। उसी प्रकार साधक को भी अनन्य भाव से श्रीश्यामा-कुंजबिहारी की भक्ति में लीन रहना चाहिए। जैसे गाय का बछड़ा अपनी माँ का दूध ही पीता है, वैसे ही साधक केवल अपने आराध्य देव की भक्ति-रस का पान करें। मृग का बच्चा मृगों के बीच ही घूमता है, वैसे ही साधक को रसिक-उपासकों का संग करना चाहिए। [3]
रसिक-शिरोमणि स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज एक सुंदर दृष्टांत देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार कोई गोपी अपने मस्तक पर दूध की मटकी संतुलित कर सखियों से परिहास करती हुई भी अपना आंतरिक ध्यान उस मटकी पर ही केंद्रित रखती है, ठीक वैसे ही तुम संसार के समस्त व्यवहार करते हुए भी अपने मन को प्रतिपल नित्य-विहार-परायण श्रीश्यामा-कुंजबिहारी के श्रीचरणों में ही निमग्न रखो। [4]
स्वामी श्रीहरिदासजी नित्य-विहार के उपासकों को यह आज्ञा देते हैं कि अपने मन को एकाग्र कर श्रीश्यामा-कुंजबिहारी से प्रेम करो। ब्रज की रज-निर्मित करुवा से स्नेह करो, और प्रतिदिन ब्रज की पावन गलियों में बुहारी देते रहो। [1]
श्रीधाम वृंदावन के बारह वन और बारह उपवनों सहित ब्रजमंडल के उन समस्त स्थलों का श्रद्धापूर्वक सेवन करो, जहाँ श्रीकृष्ण ने दिव्य विहार किया है। इन कुंजों से वन्य-पुष्प और गुञ्जा-फलों का चयन कर प्रिया-लाल (श्रीराधा-कृष्ण) के लिए अत्यंत प्रेमपूर्ण मालाएँ गुंफित करो और उन्हें अर्पित करो। [2]
गायों और मृगियों की स्नेह-भरी दृष्टि अपने बच्चों पर केंद्रित रहती है, वे अन्य बच्चों की ओर ध्यान नहीं देतीं। उसी प्रकार साधक को भी अनन्य भाव से श्रीश्यामा-कुंजबिहारी की भक्ति में लीन रहना चाहिए। जैसे गाय का बछड़ा अपनी माँ का दूध ही पीता है, वैसे ही साधक केवल अपने आराध्य देव की भक्ति-रस का पान करें। मृग का बच्चा मृगों के बीच ही घूमता है, वैसे ही साधक को रसिक-उपासकों का संग करना चाहिए। [3]
रसिक-शिरोमणि स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज एक सुंदर दृष्टांत देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार कोई गोपी अपने मस्तक पर दूध की मटकी संतुलित कर सखियों से परिहास करती हुई भी अपना आंतरिक ध्यान उस मटकी पर ही केंद्रित रखती है, ठीक वैसे ही तुम संसार के समस्त व्यवहार करते हुए भी अपने मन को प्रतिपल नित्य-विहार-परायण श्रीश्यामा-कुंजबिहारी के श्रीचरणों में ही निमग्न रखो। [4]

