(राग सारंग)
(श्री)वृंदावन के रुख हमारे मात पिता सुत बंध । [1]
गुरु गोविंद साधु गति मति सुख फल फूलनिकौ गंध ।। [2]
इनहि पीठि दै अनत डीठि करै सौ अंधनिमें अंध । [3]
व्यास इनहिं छोड़ैरु छुड़ावै ताकौ परै निकंध ।। [4]
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (119)
श्री हरिराम व्यास जी कहते है," श्री वृंदावन धाम के वृक्ष हमारी माता, पिता, पुत्र और भाई हैं। आध्यात्मिक गुरु, भगवान और विभिन्न रसिक संतों की संगति से विभिन्न प्रकार के अमृत फूलों और फलों की खुशबू का आनंद मिलता है। जो उनसे दूर हो जाता है और अन्य चीजों को स्वीकार करता है, वह सभी अंधों में सबसे अंधा व्यक्ति है। जो श्री वृंदावन धाम का त्याग करता है, वह माया से ग्रस्त है।"
(श्री)वृंदावन के रुख हमारे मात पिता सुत बंध । [1]
गुरु गोविंद साधु गति मति सुख फल फूलनिकौ गंध ।। [2]
इनहि पीठि दै अनत डीठि करै सौ अंधनिमें अंध । [3]
व्यास इनहिं छोड़ैरु छुड़ावै ताकौ परै निकंध ।। [4]
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (119)
श्री हरिराम व्यास जी कहते है," श्री वृंदावन धाम के वृक्ष हमारी माता, पिता, पुत्र और भाई हैं। आध्यात्मिक गुरु, भगवान और विभिन्न रसिक संतों की संगति से विभिन्न प्रकार के अमृत फूलों और फलों की खुशबू का आनंद मिलता है। जो उनसे दूर हो जाता है और अन्य चीजों को स्वीकार करता है, वह सभी अंधों में सबसे अंधा व्यक्ति है। जो श्री वृंदावन धाम का त्याग करता है, वह माया से ग्रस्त है।"

