किं ब्रूमोन्यत्र कुण्ठीकृतकजनपदे

किं ब्रूमोन्यत्र कुण्ठीकृतकजनपदे

किं ब्रूमोन्यत्र कुण्ठीकृतकजनपदे धाम्न्यपि श्रीविकुण्ठे
राधा माधुर्यै वित्ता मधुपतिरथ तन्माधुरीं वेत्ति राधा।
वृन्दारण्य स्थलीयं परम रस सुधा माधुरीणां धुरीणां
तद द्वन्द्वं स्वादनीयं सकलमपि ददौ राधिका किंकरीभ्यः।।

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (175)

अन्यत्र की तो बात ही क्या श्री वैकुंठ धाम भी श्री राधा माधुर्य के अभाव में कुंठित प्रदेश बन गया है क्योंकि श्री राधा के माधुर्य को केवल श्री माधव जानते हैं और श्री माधव के माधुर्य को केवल श्री राधा जानती हैं । इन आस्वादनीय युगल को परमरस सुधा माधुरी अग्रगण्य श्री वृंदावन स्थली ने श्री राधा किंकरी गणों को पूर्ण रूप से प्रदान कर दिया है ।