बातें कहत बिहार की, गरें पर्यौ जंजाल।
महल टहल तैं जाँनियै, कहा बजायैं गाल॥
-श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धान्त की साखी (373)
कुछ लोग नित्य-विहार की बातें तो करते रहते हैं, पर उनके हृदय में व्यवहार तथा अनेकानेक उपासनाओं के जंजाल भरे रहते हैं। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं— “महल की टहल करने से—अर्थात् दासी-भाव में अवस्थित होकर प्रियाजी की निकुंज-सेवा करने से—ही नित्य-विहार का स्वरूप हृदय में प्रकट होता है; केवल गाल बजाने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता।”
महल टहल तैं जाँनियै, कहा बजायैं गाल॥
-श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की बानी, सिद्धान्त की साखी (373)
कुछ लोग नित्य-विहार की बातें तो करते रहते हैं, पर उनके हृदय में व्यवहार तथा अनेकानेक उपासनाओं के जंजाल भरे रहते हैं। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं— “महल की टहल करने से—अर्थात् दासी-भाव में अवस्थित होकर प्रियाजी की निकुंज-सेवा करने से—ही नित्य-विहार का स्वरूप हृदय में प्रकट होता है; केवल गाल बजाने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता।”

