अलक्ष्याः श्रीलक्ष्म्या अपि - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.85)

अलक्ष्याः श्रीलक्ष्म्या अपि - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.85)

अलक्ष्याः श्रीलक्ष्म्या अपि च भगवत्या भगवतः
यदा वक्षस्थाया मधुरमधुराः केचन रसाः।
अहो! यद् दासीभिः सततमनुभूयन्त ऊरुभिः
प्रकारैस्तां राधां भज दयित! वृन्दावनवने।।

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.85)

भगवती श्रीलक्ष्मी देवी सदा श्री भगवान की वक्ष स्थल-विलासिनी होते हुए भी जिन किन्हीं-किन्हीं मधुरतम रसों का आस्वादन नहीं कर सकती- अहो! जिनकी दासियां भी अनेक प्रकार से उस रस का सर्वदा आस्वादन करती हैं, हे प्रिय! श्रीवृन्दावन वास करके उन श्रीराधा जी का भजन कर ।