(सवैया)
कैसौ फव्यौ है नीलांबर सुंदर, मोहि लिये मन-मोहन माई। [1]
फैलि रही छवि अंगनि कांति, लसै बहु भाँति सुदेस सुहाई॥ [2]
सीस कौ फूल सुहाग कौ छत्र, सदा पिय के मन कौं सुखदाई। [3]
और कछू न रुचै ध्रुव पीय कौं, भावै यहै सुकुमारि लडाई॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (06)
हे सखी! श्री प्रिया के गौर अंग पर नील निचोल की आभा कितनी अद्भुत प्रतीत हो रही है, जिसने स्वयं मनमोहन श्रीलाल जी के हृदय को भी मोहित कर लिया है। [1]
उनके श्री अंग की दिव्य छटा चारों ओर आलोकित हो रही है, जो हर दृष्टि से सुंदरता और सुहावनता का परिपूर्ण दृश्य है। [2]
श्री प्रिया के ललाट पर सुशोभित शीश-फूल, उनके सौभाग्य का छत्र बनकर प्रियतम के मन को निरंतर आकर्षित करता है। [3]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं—प्रियतम को इस अनुपम छवि के अतिरिक्त और कुछ भी रुचिकर नहीं प्रतीत होता। वे तो सदा ऐसी सुकुमारी, लाड़िली श्री प्रिया को लाड़-लड़ाने के इच्छुक बने रहते हैं। [4]
कैसौ फव्यौ है नीलांबर सुंदर, मोहि लिये मन-मोहन माई। [1]
फैलि रही छवि अंगनि कांति, लसै बहु भाँति सुदेस सुहाई॥ [2]
सीस कौ फूल सुहाग कौ छत्र, सदा पिय के मन कौं सुखदाई। [3]
और कछू न रुचै ध्रुव पीय कौं, भावै यहै सुकुमारि लडाई॥ [4]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (06)
हे सखी! श्री प्रिया के गौर अंग पर नील निचोल की आभा कितनी अद्भुत प्रतीत हो रही है, जिसने स्वयं मनमोहन श्रीलाल जी के हृदय को भी मोहित कर लिया है। [1]
उनके श्री अंग की दिव्य छटा चारों ओर आलोकित हो रही है, जो हर दृष्टि से सुंदरता और सुहावनता का परिपूर्ण दृश्य है। [2]
श्री प्रिया के ललाट पर सुशोभित शीश-फूल, उनके सौभाग्य का छत्र बनकर प्रियतम के मन को निरंतर आकर्षित करता है। [3]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं—प्रियतम को इस अनुपम छवि के अतिरिक्त और कुछ भी रुचिकर नहीं प्रतीत होता। वे तो सदा ऐसी सुकुमारी, लाड़िली श्री प्रिया को लाड़-लड़ाने के इच्छुक बने रहते हैं। [4]

