[राग कालिंगड़ा तीन ताल ]
भज मन श्री राधा गोपाल ।
गोल कपोल अधर बिंबाफल, लोचन परम विशाल ॥ [1]
शुक नासा भौं दूज चंद्र सम, अति सुंदर है भाल ।
मुकुट चन्द्रिका शीश लसत है, घुंघरारे बर बाल ॥ [2]
रतन जटित कुण्डल कर कंकण, गल मुतियन की माल ।
पग नूपुर मणिखचित बजट जब, चलत हंसगति चाल ॥ [3]
गौर श्याम तन बसन अमोलिक, कर महँदी सों लाल ।
मृदु मुसिक्यान मनोहर चितवन, बोलन अधिक रसाल ॥ [4]
कुंज भवन में बैठ दोउ जन, गावत अद्भुत ख्याल ।
नारायण या छबिको निरखत, पुनि पुनि होत निहाल ॥ [5]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, पद सिद्धान्त (10)
इस पद में श्री नारायण स्वामी जी ने श्री युगल सरकार के अत्यंत मनोहर रूप का वर्णन किया है।
वह कहते हैं कि, अरे मन तू श्री राधा कृष्ण का भजन कर, जिनके गोल गाल हैं, होंठ मीठे फल के जैसे एवं नयन अत्यंत विशाल हैं । [1]
जिनकी तोते जैसी सुन्दर नासिका है, बौहें चंद्र समान हैं और अत्यंत सुंदर माथा है।
जिनके शीर्ष पर सुंदर मणि मुकुट विराजमान है तथा उनके चेहरे से लटकती घुँघरारी लटें सोभित हैं। [2]
कर्ण में रत्नों से जटित कुंडल सुशोभित है, जो सुंदर ध्वनि कर रही है एवं उन्होंने मोतियों की माला गले में धारण कर रखी है।
युगल सरकार ने चरणों में मणियों से खचित नूपुर धारण किये हैं जो सुन्दर ध्वनि करते हैं और हंस की चाल धारण कर रखी है। [3]
श्री राधा रानी गौर वर्ण की है एवं श्री कृष्ण श्याम वर्ण के हैं परंतु श्री राधा रानी ने श्याम वरण के वस्त्र धारण कर रखें एवं श्री कृष्णा ने गौर वर्ण के वस्त्र धारण कर रखें हैं। युगल सरकार ने अपने हाथों में लाल रंग की मेहंदी लगा रखी है।
युगल सरकार की मुस्कान बहुत मधुर है, चितवन मनोहर है एवं बोलनी अत्यंत रसाल है। [4]
जब यह हमारे युगल सरकार कुंज भवन में बैठते हैं और अत्यंत मधुर स्वर से गाते हैं तब इनकी छवि देखते ही बनती है।
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि मैं तो इनकी यह छवि देखकर बार-बार निहाल हो जाता हूँ । [5]
भज मन श्री राधा गोपाल ।
गोल कपोल अधर बिंबाफल, लोचन परम विशाल ॥ [1]
शुक नासा भौं दूज चंद्र सम, अति सुंदर है भाल ।
मुकुट चन्द्रिका शीश लसत है, घुंघरारे बर बाल ॥ [2]
रतन जटित कुण्डल कर कंकण, गल मुतियन की माल ।
पग नूपुर मणिखचित बजट जब, चलत हंसगति चाल ॥ [3]
गौर श्याम तन बसन अमोलिक, कर महँदी सों लाल ।
मृदु मुसिक्यान मनोहर चितवन, बोलन अधिक रसाल ॥ [4]
कुंज भवन में बैठ दोउ जन, गावत अद्भुत ख्याल ।
नारायण या छबिको निरखत, पुनि पुनि होत निहाल ॥ [5]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, पद सिद्धान्त (10)
इस पद में श्री नारायण स्वामी जी ने श्री युगल सरकार के अत्यंत मनोहर रूप का वर्णन किया है।
वह कहते हैं कि, अरे मन तू श्री राधा कृष्ण का भजन कर, जिनके गोल गाल हैं, होंठ मीठे फल के जैसे एवं नयन अत्यंत विशाल हैं । [1]
जिनकी तोते जैसी सुन्दर नासिका है, बौहें चंद्र समान हैं और अत्यंत सुंदर माथा है।
जिनके शीर्ष पर सुंदर मणि मुकुट विराजमान है तथा उनके चेहरे से लटकती घुँघरारी लटें सोभित हैं। [2]
कर्ण में रत्नों से जटित कुंडल सुशोभित है, जो सुंदर ध्वनि कर रही है एवं उन्होंने मोतियों की माला गले में धारण कर रखी है।
युगल सरकार ने चरणों में मणियों से खचित नूपुर धारण किये हैं जो सुन्दर ध्वनि करते हैं और हंस की चाल धारण कर रखी है। [3]
श्री राधा रानी गौर वर्ण की है एवं श्री कृष्ण श्याम वर्ण के हैं परंतु श्री राधा रानी ने श्याम वरण के वस्त्र धारण कर रखें एवं श्री कृष्णा ने गौर वर्ण के वस्त्र धारण कर रखें हैं। युगल सरकार ने अपने हाथों में लाल रंग की मेहंदी लगा रखी है।
युगल सरकार की मुस्कान बहुत मधुर है, चितवन मनोहर है एवं बोलनी अत्यंत रसाल है। [4]
जब यह हमारे युगल सरकार कुंज भवन में बैठते हैं और अत्यंत मधुर स्वर से गाते हैं तब इनकी छवि देखते ही बनती है।
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि मैं तो इनकी यह छवि देखकर बार-बार निहाल हो जाता हूँ । [5]

