(राग गौड़ व राग मल्हार)
हौं बलि जाँउ नगरी श्याम ।
ऐसैं ही रंग करौ निशि-बासर, वृन्दाविपिन कुटी अभिराम ॥ [1]
हास-विलास सुरत रस सींचन, पशुपति-दग्ध जिवावत काम ।
हित हरिवंश लोल लोचन-अलि, करहु न सफल सकल सुख धाम ॥ [2]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (56)
भावार्थ - श्री हित सजनी आशीर्वाद देती हैं - "हे नागरी ! (श्री राधा) हे श्री श्याम (श्री कृष्ण) मैं आप पर बलिहार जाऊं ।(आप दोनों) वृंदावन की सुंदर कुंज कुटी में रात दिन निरंतर इसी प्रकार आनंदमय रंग विहार ही करते रहो ! [1]
निरंतर हास विलास एवं सूरत रस के सिंचन द्वारा पशुपति शिव जी के द्वारा जलाये गए (दग्ध किये गये) कामदेव को जीवन दान देते हुए हे सकल सुख धाम ! हमारे लोल लोचन रूप भ्रमरों को सफल कीजिए न !" (अर्थात आप दोनों स्वछन्द भाव से रति विलास करें और हम उसका दर्शन करके सुखी हों । [2]
हौं बलि जाँउ नगरी श्याम ।
ऐसैं ही रंग करौ निशि-बासर, वृन्दाविपिन कुटी अभिराम ॥ [1]
हास-विलास सुरत रस सींचन, पशुपति-दग्ध जिवावत काम ।
हित हरिवंश लोल लोचन-अलि, करहु न सफल सकल सुख धाम ॥ [2]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, हित चौरासी (56)
भावार्थ - श्री हित सजनी आशीर्वाद देती हैं - "हे नागरी ! (श्री राधा) हे श्री श्याम (श्री कृष्ण) मैं आप पर बलिहार जाऊं ।(आप दोनों) वृंदावन की सुंदर कुंज कुटी में रात दिन निरंतर इसी प्रकार आनंदमय रंग विहार ही करते रहो ! [1]
निरंतर हास विलास एवं सूरत रस के सिंचन द्वारा पशुपति शिव जी के द्वारा जलाये गए (दग्ध किये गये) कामदेव को जीवन दान देते हुए हे सकल सुख धाम ! हमारे लोल लोचन रूप भ्रमरों को सफल कीजिए न !" (अर्थात आप दोनों स्वछन्द भाव से रति विलास करें और हम उसका दर्शन करके सुखी हों । [2]

