जो कछु करौ सो समुझि कै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (25)

जो कछु करौ सो समुझि कै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (25)

जो कछु करौ सो समुझि कै, बिनु समझै करि नाहिं।
बिनु समझै जिन जिन करी, परे अंध तन माहिं॥

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (25)

तुम जो कुछ भी कर रहे हो, उसे खूब सोच-समझकर करो। भगवतरसिक जी कहते हैं कि जिन लोगों ने बिना सोचे-समझे कर्म किया है, वे सब घने अंधकार में विलीन हो चुके हैं।