प्रेम सिंधु वृन्दाविपिन - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (109)

प्रेम सिंधु वृन्दाविपिन - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (109)

प्रेम सिंधु वृन्दाविपिन,जाकौ अन्त न आदि।
जहाँ कलोलत रहत नित, युगल किशोर अनादि॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (109)

श्री वृन्दावन दिव्य प्रेम का आगाध सिंधु है, जहाँ अनादि काल से श्री राधावल्लभ युगल किशोर कल्लोलमान हैं।