हमारी अलबेली सरकार - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा माधुरी (53)

हमारी अलबेली सरकार - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा माधुरी (53)

हमारी अलबेली सरकार।
रसिक रँगीली गुन गर्वीली, रसिकन की रिझवार।
विधि निषेध, मर्याद वेद की, रहति न येहि दरबार।
त्रिगुण, त्रिकर्म, त्रिताप नसावति, देति प्रेम- उपहार।
पलक ढाँपि राखत पुतरिन ज्योँ, प्रणत भये इकबार।
डरत ‘कृपालु’ जासु डर गिरिधर, सो हमार रखवार।।

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा माधुरी (53)

हमारी स्वामिनी रसिकता की सीमा स्वरूपिणी हैं। वे रसिकों को सुख देने वाली, रिझाने वाली तथा समस्त गुणों की खान हैं। इनके दरबार में वेद के विधि निषेध की मर्यादा का प्रवेश नहीं है। श्री किशोरी जी सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण और संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण कर्म एवं दैहिक, दैविक, भौतिक तापों को नष्ट करके विशुद्ध प्रेम प्रदान करती हैं। एक बार भी शरण में आये हुए जीव को, आँखों में पुतली के समान पलक से ढाँप कर रखती हैं। ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि जिन किशोरी जी के डर से कालात्मा गिरिधर भी डरते हैं, वे ही हमारी रक्षा करने वाली, हमारी अलबेली सरकार हैं ।