महाभाग्यैः प्राप्तं वपुरिदमिहाकर्णि महिमा - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.80)

महाभाग्यैः प्राप्तं वपुरिदमिहाकर्णि महिमा - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.80)

महाभाग्यैः प्राप्तं वपुरिदमिहाकर्णि महिमाऽ-
द्भुतो वृन्दाटव्याः कलितमखिलं स्वप्नसदृशम्।
शुभायामाश्वासो नहि नहि मतौ नापि वपुषि
क्षणेऽस्मिन्नेव त्वं तदभिचल वृन्दावनवनम्।।

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.80)

महाभाग्य से यह (नरतन) देह पाया है, (महाभाग्य से) श्री वृन्दावन की अद्भुत महिमा भी सुनी है, समस्त संसार स्वप्न समान है- यह भी (महाभाग्य से) जान लिया है, शुभ बुद्धि का अश्वास नहीं किया जाता (आज शुभ बुद्धि है, कल न भी रहे) और शरीर का भी विश्वास नहीं है, अतः इसी क्षण ही तू श्रीवृन्दावन के लिये प्रस्थान कर ।