टेरी सुनौ वृषभानु किशोरी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (197)

टेरी सुनौ वृषभानु किशोरी - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (197)

टेरी सुनौ वृषभानु किशोरी ।
बीती वृथा आयु बहुतेरी, शेष रही अति थोरी ॥ [1]
मन अकुलात उपाय न सूझत, शरण गही दृढ़ तोरी ।
भोरी सहज कृपालु निहारौ, नैक कृपा की कोरी ॥ [2]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (197)

हे श्री राधे, मेरी विनती सुनो!
अधिकांश आयु वृथा ही बीत चुका है, बहुत कम अब शेष है । [1]

दिन-रात बेचैनी से भटक रहा हूँ , और कोई दूसरा साधन नहीं मिला, मैं सीधे आपके चरण कमलों में आ गया, आपको अपना एकमात्र सहारा मानता हूं ।
श्री भोरी सखि कहती हैं, "हे मेरी दयालु कृपालु स्वामिनी, कृपया मेरे ऊपर एक बार के लिए ही सही आप अपनी करुणा दृष्टि कीजिये ।" [2]