(राग आसावरी)
तिनुका ज्यौं बयार के बस।
ज्यौं चाहै त्यौं उड़ाय लै डारे अपने रस॥ [1]
ब्रह्म लोक सिवलोक और लोक अस।
कहिं श्री हरिदास विचार देखौ विना बिहारी नाहिं जस॥ [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, अष्टादश पद (8)
जिस प्रकार पृथ्वी पर पड़ा हुआ एक तुच्छ तृण पूर्णतः पवन के वेग पर आश्रित होता है—वायु उसे जिस दिशा में उड़ाकर ले जाती है, उसे विवश होकर वहीं जाना पड़ता है—उसका अपना कोई स्वतंत्र सामर्थ्य नहीं होता। [1]
ठीक उसी प्रकार ब्रह्मलोक, शिवलोक और ब्रह्मांड के समस्त लोक साक्षात् श्रीबिहारीजी के संकल्प के अधीन हैं। यह जीव भी उनकी अपरा माया-शक्ति के वशीभूत होकर ही समस्त चेष्टाएँ करता है। रसिक-नृपति स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज उद्घोष करते हैं, “तुम सर्वथा विवेकपूर्वक विचार कर लो; श्रीबिहारीजी की अहैतुकी कृपा के बिना उस परम दुर्लभ नित्य-यश और वास्तविक कृपा-प्रसाद को प्राप्त करना सर्वथा असंभव है।” [2]
तिनुका ज्यौं बयार के बस।
ज्यौं चाहै त्यौं उड़ाय लै डारे अपने रस॥ [1]
ब्रह्म लोक सिवलोक और लोक अस।
कहिं श्री हरिदास विचार देखौ विना बिहारी नाहिं जस॥ [2]
- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, अष्टादश पद (8)
जिस प्रकार पृथ्वी पर पड़ा हुआ एक तुच्छ तृण पूर्णतः पवन के वेग पर आश्रित होता है—वायु उसे जिस दिशा में उड़ाकर ले जाती है, उसे विवश होकर वहीं जाना पड़ता है—उसका अपना कोई स्वतंत्र सामर्थ्य नहीं होता। [1]
ठीक उसी प्रकार ब्रह्मलोक, शिवलोक और ब्रह्मांड के समस्त लोक साक्षात् श्रीबिहारीजी के संकल्प के अधीन हैं। यह जीव भी उनकी अपरा माया-शक्ति के वशीभूत होकर ही समस्त चेष्टाएँ करता है। रसिक-नृपति स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज उद्घोष करते हैं, “तुम सर्वथा विवेकपूर्वक विचार कर लो; श्रीबिहारीजी की अहैतुकी कृपा के बिना उस परम दुर्लभ नित्य-यश और वास्तविक कृपा-प्रसाद को प्राप्त करना सर्वथा असंभव है।” [2]

