जीभ जुगल नामहिं जपै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (16)

जीभ जुगल नामहिं जपै - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (16)

जीभ जुगल नामहिं जपै, दृगन बिलोकै रूप।
उदर भरै अलिवृत्ति सौं, छाँड़ि स्वान, मृग - भूप॥

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (16)

साधक को चाहिए कि वह कुत्ते और मृगराज-सिंह की वृत्ति को त्यागकर मधुकरी वृत्ति से उदर-पूर्ति करता हुआ, जीभ से श्री युगल का नाम-स्मरण और नेत्रों से उनके रूप-माधुरी का अवलोकन करता रहे।