ऐसैं हिय में बसत रहौ, नव-किसोर रस-रासि ।
चितवनि अति अनुराग की, करत मंद मृदु हाँसि ॥ [1]
करत मंद मृदु हाँसि दोउ, होत जु प्रेम प्रकास ।
छके रहत मदमत्त गति, आनँद मदन विलास ॥ [2]
'हित ध्रुव' छबि सौं कुंज में, दै अंसनि-भुज वैसे ।
मेरी मति इति नाहिं, कहौं उपमा दै ऐसे ॥ [3]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलिया (11)
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि वह छवि मेरे ह्रदय में नित्य प्रतिबिंबित रहे, जब रसनिधि नवल किशोर हास-परिहास परायण होते हैं, उस समय कि उनकी चितवन सरस अनुराग-भीनी होती है । [1]
उनके उस मधुर हास्य विनोद में भी हार्दिक प्रीति का प्रकाश होता है । प्रेम-छके ये किशोर नव-दंपति अनंग-क्रीड़ा के विविध विलासों में प्रेमोन्मत्त बने रहते हैं । [2]
निभृत-निकुंज-स्थल में भुजाओं को परस्पर स्कन्धों पर न्यस्त किये हुए प्रेम-छके ये मिथुन किशोर नित्य-नवीन शोभा से युक्त होते हैं । उस समय उनकी अनुपम शोभा की उपमा देने के लिए मेरी मति सर्वथा असमर्थ है ।
चितवनि अति अनुराग की, करत मंद मृदु हाँसि ॥ [1]
करत मंद मृदु हाँसि दोउ, होत जु प्रेम प्रकास ।
छके रहत मदमत्त गति, आनँद मदन विलास ॥ [2]
'हित ध्रुव' छबि सौं कुंज में, दै अंसनि-भुज वैसे ।
मेरी मति इति नाहिं, कहौं उपमा दै ऐसे ॥ [3]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, भजन कुण्डलिया (11)
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि वह छवि मेरे ह्रदय में नित्य प्रतिबिंबित रहे, जब रसनिधि नवल किशोर हास-परिहास परायण होते हैं, उस समय कि उनकी चितवन सरस अनुराग-भीनी होती है । [1]
उनके उस मधुर हास्य विनोद में भी हार्दिक प्रीति का प्रकाश होता है । प्रेम-छके ये किशोर नव-दंपति अनंग-क्रीड़ा के विविध विलासों में प्रेमोन्मत्त बने रहते हैं । [2]
निभृत-निकुंज-स्थल में भुजाओं को परस्पर स्कन्धों पर न्यस्त किये हुए प्रेम-छके ये मिथुन किशोर नित्य-नवीन शोभा से युक्त होते हैं । उस समय उनकी अनुपम शोभा की उपमा देने के लिए मेरी मति सर्वथा असमर्थ है ।

