महिमा वृन्दाविपिन की, कहि न सकत मम जीह।
जाके रसना द्वै सहस, तीनहूँ काढ़ी लीह॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (111)
मेरी जिह्वा तो श्री वृन्दावन की महिमा गाने में सर्वथा असमर्थ है। अरे, दो सहस्त्र जिह्वाओं वाले शेषनाग भी जिसे कहते-कहते थक जाते हैं और अंततः हार मान लेते हैं।
जाके रसना द्वै सहस, तीनहूँ काढ़ी लीह॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (111)
मेरी जिह्वा तो श्री वृन्दावन की महिमा गाने में सर्वथा असमर्थ है। अरे, दो सहस्त्र जिह्वाओं वाले शेषनाग भी जिसे कहते-कहते थक जाते हैं और अंततः हार मान लेते हैं।

