देखौ इनि लोगन की लावनि - स्वामी श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (11)

देखौ इनि लोगन की लावनि - स्वामी श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (11)

(राग आसावरी)
देखौ इनि लोगन की लावनि।
बूझत नाँहिं हरि चरनकमल कौं, मिथ्या जन्म गँवावनि॥ [1]
जब जमदूत आइ घेरत, तब करत आप मन-भावनि।
कहिं श्रीहरिदास तबहिं चिरजीवौ, जब कुंजबिहारी चितावनि॥ [2]

- ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (11)
 
इस पद में श्रीहरिदासजी संसार के प्रति जीव की आसक्ति और श्रीबिहारीजी के प्रति उसकी उदासीनता का वर्णन कर रहे हैं।

स्वामी हरिदासजी कहते हैं कि इन संसारी जीवों की विचित्र प्रीति (लावनि) तो देखो! ये साक्षात् आनंद-निधि श्रीबिहारीजी की भक्ति का परित्याग कर, मिथ्या और क्षणभंगुर संसार के प्रपंचों में पूर्णतः निमग्न हैं। इस प्रकार ये अज्ञानी जीव देवों के लिए भी दुर्लभ इस बहुमूल्य मानव-देह को व्यर्थ ही गँवा रहे हैं। [1]

इन्हें इस दारुण सत्य का तनिक भी भान नहीं है कि जब काल के दूत इन्हें लेने आएँगे, तो वे कुछ भी नहीं कर सकेंगे। यमदूत इन्हें बलपूर्वक घसीटते हुए यमलोक ले जाएँगे और ये विवश होकर अपनी रक्षा भी नहीं कर सकेंगे। श्रीस्वामीजी महाराज जीव को झकझोरते हुए सचेत करते हैं, “हे जीव! अब भी समय है, केवल श्रीबिहारीजी का ही अनन्य चिंतन कर। उनकी शरणागति से ही तुझे उस शाश्वत परमानंद और दिव्य नित्य-रस का अनुभव प्राप्त होगा।” [2]