साधो शक्नोषि नो चेत् सकलमपि हठात् स्वप्नकल्पं विहातुं तर्हि त्वं ध्याय वृन्दावनमनिशमथोपास्य वृन्दावनेऽसौ।
तन्नामान्येव नित्यं जप सततमथो तत्कथां संशृणुष्व श्रीमद् वृन्दावनस्थानथ परिचर भो भोजनाच्छादनाद्यैः।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.72)
हे साधो! यदि तू इन समस्त स्वप्रकल्पित वस्तुओं का सहसा त्याग नहीं कर सकता, तो श्री वृन्दावन के युगल-किशोर की उपासना करते हुए निरन्तर श्री वृन्दावन का ध्यान कर। प्रति क्षण उनके नामों का जप कर, निरन्तर उनकी कथाओं (लीलाओं) को श्रवण कर और सब वृन्दावन वासियों को भोजन वस्त्रादि देकर उनकी सेवा कर।
तन्नामान्येव नित्यं जप सततमथो तत्कथां संशृणुष्व श्रीमद् वृन्दावनस्थानथ परिचर भो भोजनाच्छादनाद्यैः।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.72)
हे साधो! यदि तू इन समस्त स्वप्रकल्पित वस्तुओं का सहसा त्याग नहीं कर सकता, तो श्री वृन्दावन के युगल-किशोर की उपासना करते हुए निरन्तर श्री वृन्दावन का ध्यान कर। प्रति क्षण उनके नामों का जप कर, निरन्तर उनकी कथाओं (लीलाओं) को श्रवण कर और सब वृन्दावन वासियों को भोजन वस्त्रादि देकर उनकी सेवा कर।

