निजु प्रिय कीनी अपनपौ - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (284)

निजु प्रिय कीनी अपनपौ - श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (284)

निजु प्रिय कीनी अपनपौ, तन मन रही समाइ।
तू मेरी है प्राण सखी, पोषत मन के भाइ॥

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (284)

रिझवार-चूड़ामणि श्री स्वामिनी जू ने मुझे अपनी निज कर लिया और वे मेरे तन-मन में समा गईं। मेरे मन के भावों का पोषण कर मुझसे बोलीं— “तू तो मेरी प्राण-सखी ही है।"