एती मति मोपै कहा, सोभा निधि बनराज।
ढीठौ कै कछु कहत हौं, आवत नहिं जिय लाज॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (112)
शोभा की सीमा श्री वृन्दावन की बात कहने के लिए मुझमें मति कहाँ से आई है? फिर भी निर्लज्ज होकर, धृष्टतापूर्वक ही कुछ कह रहा हूँ।
ढीठौ कै कछु कहत हौं, आवत नहिं जिय लाज॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (112)
शोभा की सीमा श्री वृन्दावन की बात कहने के लिए मुझमें मति कहाँ से आई है? फिर भी निर्लज्ज होकर, धृष्टतापूर्वक ही कुछ कह रहा हूँ।

