मति प्रमान चाहत कह्यौ, सोऊ कहत लजात।
सिन्धु अगम जिहिं पार नहिं, कैसे सीप समात॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (113)
अपनी सीमित बुद्धि के साथ मैं दिव्य वृन्दावन की महिमा पर कुछ शब्द कहने का प्रयास कर रहा हूँ; परंतु स्वयं को अत्यंत सीमित अनुभव करता हूँ—मानो कोई अनन्त सागर को एक छोटे-से सीप में समेटने का प्रयास कर रहा हो।
सिन्धु अगम जिहिं पार नहिं, कैसे सीप समात॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (113)
अपनी सीमित बुद्धि के साथ मैं दिव्य वृन्दावन की महिमा पर कुछ शब्द कहने का प्रयास कर रहा हूँ; परंतु स्वयं को अत्यंत सीमित अनुभव करता हूँ—मानो कोई अनन्त सागर को एक छोटे-से सीप में समेटने का प्रयास कर रहा हो।

