[राग गौरी]
मेरे तू जिय में बसत नवल प्रिय प्राण प्यारी ।
तेरेई दरस परस राग रंग उपजत, मान न कीजै हौ हौ री ।।
तू ही जीवन तू ही प्राण तू ही सकल गुण निधान ।
तो समान और नाहिन मोको हितकारी ।।
‘व्यास’ की स्वामिनी तेरी ही माया ते पायो नाम बिहारी ।।
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (200)
श्री कृष्ण श्री राधा रानी से कहते हैं, हे नित्य नवेली, मेरी प्रिय प्राण प्यारी जू, मेरे हृदय में तो केवल आप बसी हो ।
मेरे तू जिय में बसत नवल प्रिय प्राण प्यारी ।
तेरेई दरस परस राग रंग उपजत, मान न कीजै हौ हौ री ।।
तू ही जीवन तू ही प्राण तू ही सकल गुण निधान ।
तो समान और नाहिन मोको हितकारी ।।
‘व्यास’ की स्वामिनी तेरी ही माया ते पायो नाम बिहारी ।।
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (200)
श्री कृष्ण श्री राधा रानी से कहते हैं, हे नित्य नवेली, मेरी प्रिय प्राण प्यारी जू, मेरे हृदय में तो केवल आप बसी हो ।
आपके दर्शन एवं स्पर्श से मुझे राग एवं रंग, रस (पूर्णता) की अनुभूति होती है, स्वामिनी कृपया मुझसे मान न कीजिए।
आप ही मेरा जीवन हो, आप ही मेरी प्राण हो, आप ही केवल समस्त गुणों की खान हो।
आपके समान ऐसा विश्व में कोई भी नहीं है जो मेरा हितकारी है क्यूंकि केवल आप ही मेरा सुख जानती हो एवं पूर्ण करती हो। आपसे बढ़कर मुझे और कोई सुख नहीं देता।
श्री हरिराम व्यास जी महाराज कहते हैं कि, "श्री कृष्ण बोले, हे श्री बिहारिणी आपकी कृपा एवं बल से ही मैंने बिहारी नाम पाया है, जिससे हमें लोग बिहारीजी के नाम से जानते हैं"। ('बिहारी - जो नित्य ही विहार करते हैं') ।

