पायो बड़े भाग्यन सों आसरो किशोरी जू कौ - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, हरि पद संग्रह (50)

पायो बड़े भाग्यन सों आसरो किशोरी जू कौ - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, हरि पद संग्रह (50)

(कवित्त)
पायो बड़े भाग्यन सों आसरो किशोरी जू कौ,
ओर निरवाहि ताहि नीके गहि गहिरे। [1]
नैननि सौं निरखि लड़ैती जू को वदन चन्द्र,
ताही के चकोर ह्वैके रूपसुधा चहिरे॥ [2]
स्वामिनी की कृपासों आधीन हुयी हैं 'ब्रजनिधि',
ताते रसनासों सदां श्यामा नाम कहिरे। [3]
मन मेरे मीत जोपै कह्यो माने मेरो तौं,
राधा पद कंज कौ भ्रमर है के रहिरे॥ [4]
- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, हरि पद संग्रह (50)

हे मेरे मन, यह अत्यंत सौभाग्य की बात है कि तुमने श्री किशोरी जी की शरण ली है। अब इस प्रतिज्ञा पर खरा उतरने का प्रयास करो और इस समर्पण के मूल्यों को गहराई से समझो। [1]

नित्य प्रति एक चकोर पक्षी की भाँति श्री किशोरी जी के मुखचंद्र पर टकटकी लगाए रहो, और इसके अतिरिक्त किसी भी अन्य इच्छा का त्याग कर दो। केवल किशोरि जी की रूप माधुरी का पान करना ही तुम्हारी एकमात्र इच्छा होनी चाहिए। [2]

ब्रज की महारानी, श्री राधारानी की कृपा से ही तुम उन पर आश्रित हो गए हो, जिनपर साक्षात श्री कृष्ण भी सदा आश्रित रहते हैं। इसलिए, नित्य ही उनका नाम “श्यामा” रटते रहो। [3]

श्री ब्रज निधि जी कहते हैं, "हे प्रिय मन, मेरे प्रिय मित्र, अगर तुम मेरी बात मानो, तो मैं तुमसे यही कहता हूँ कि श्री किशोरी जी के चरण-कमल के मधुर रस पर भँवर की भाँति नित्य मंडराते रहो।" [4]