श्री मुख यों न बखान सके - श्री रसखान जी 

श्री मुख यों न बखान सके - श्री रसखान जी 

(सवैया)
श्री मुख यों न बखान सके, वृषभानु सुता जू को रूप उजारौ। [1]
हे रसखान तू ज्ञान संभार, नैन निहार जु रीझन हारौ॥ [2]
चारू सिंदूर को लाल रसाल, लसै वृजबाल को भाल टीकारौ। [3]
गोद में मानौं विराजत है, घनश्याम के सारे के सारे को सारौ॥ [4]
- श्री रसखान जी
 

वृषभानु-नंदिनी श्री राधा के मुखचंद्र की अनुपम छवि का वर्णन स्वयं वाणी की देवी सरस्वती भी करने में असमर्थ हैं। [1]

श्री रसखान कहते हैं—पहले अपने सारे ज्ञान का अहंकार त्याग दो, और फिर प्रेममयी दृष्टि से उन्हें निहारो। [2]

उनके सुंदर ललाट पर सिंदूर से सुशोभित लाल रसाल तिलक अनुपम शोभा बिखेर रहा है। [3]

जब श्री राधा श्री कृष्ण की गोद में विराजमान होती हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो सृष्टि के सम्पूर्ण सौंदर्य और कलाओं का सार उनकी गोद में सिमट आई हो। [4]