(राग दीपचंदी)
नन्द को लाल गोपाल माल उर, भ्रमत रहत नवबाल के चायन ।
खंजन नैन बैन मन रंजन, अंजन नैन मैन सकुचायन॥ [1]
ललित किशोरी हेरि इतै कित, जाहि उतै निज सहज सुभायन ।
कदम्ब की कुंज कुटीर कहुँ वह, ह्वै है पलोटत राधिका पायन॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, फुटकर पद (49)
फूलों की माला से सुशोभित नन्दलाल श्रीकृष्ण, श्रीराधा के मुख-कमल दर्शन की लालसा में भ्रमर की भांति मंडराते रहते हैं। उन श्री राधा के खंजन-समान नेत्र, मधुर वाणी, मृदु मुस्कान और काजल से रँगे नयन देखकर स्वयं कामदेव भी संकुचित हो जाते हैं। [1]
जहाँ ललित किशोरी श्रीराधा अपनी दृष्टि डालती हैं, वहीं श्रीकृष्ण सहज भाव से निहारने लगते हैं। कदंब-कुंज की मनोहर कुटीर में बैठकर श्रीकृष्ण, श्रीराधा के चरण दबाते हुए उनके श्री चरणों की सदा सेवा करके आनंदित होते हैं। [2]
नन्द को लाल गोपाल माल उर, भ्रमत रहत नवबाल के चायन ।
खंजन नैन बैन मन रंजन, अंजन नैन मैन सकुचायन॥ [1]
ललित किशोरी हेरि इतै कित, जाहि उतै निज सहज सुभायन ।
कदम्ब की कुंज कुटीर कहुँ वह, ह्वै है पलोटत राधिका पायन॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, फुटकर पद (49)
फूलों की माला से सुशोभित नन्दलाल श्रीकृष्ण, श्रीराधा के मुख-कमल दर्शन की लालसा में भ्रमर की भांति मंडराते रहते हैं। उन श्री राधा के खंजन-समान नेत्र, मधुर वाणी, मृदु मुस्कान और काजल से रँगे नयन देखकर स्वयं कामदेव भी संकुचित हो जाते हैं। [1]
जहाँ ललित किशोरी श्रीराधा अपनी दृष्टि डालती हैं, वहीं श्रीकृष्ण सहज भाव से निहारने लगते हैं। कदंब-कुंज की मनोहर कुटीर में बैठकर श्रीकृष्ण, श्रीराधा के चरण दबाते हुए उनके श्री चरणों की सदा सेवा करके आनंदित होते हैं। [2]

