क्वासौ राधा निगम पदवीदुरगा कुत्र चासौ कृष्णस्तस्याः कुचकमलयोरन्तरै कान्तवासः । - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (260)

क्वासौ राधा निगम पदवीदुरगा कुत्र चासौ कृष्णस्तस्याः कुचकमलयोरन्तरै कान्तवासः । - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (260)

क्वासौ राधा निगम पदवीदुरगा कुत्र चासौ कृष्णस्तस्याः कुचकमलयोरन्तरै कान्तवासः ।
क्वाहं तुच्छ परममधमः प्राण्यहो गर्ह्मकर्मा यत्तन्नाम स्फुरति महिमा एष वृन्दावनस्य ।।

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (260)

कहाँ तो वैदिक मार्ग से दूर वे श्री राधा, कहाँ उनके कुच-कमलों के मध्य में एकान्त निवास करने वाले वे श्री कृष्ण और कहाँ मैं तुच्छ, परम अधम और निन्दनीय कर्म करने वाला साधारण जीव ! आश्चर्य है कि फिर भी उनका ( श्री राधा का) नाम मेरे हृदय में प्रकाशित होता है, यह श्रीवृन्दावन की ही महिमा है ।।