(कवित्त)
अल्ला बिसमिल्ला रहिमान और रहीम छोड़,
पीर और शहीदों की चर्चा न चलाऊँगी। [1]
सूथना उतार पहिन घांघरा घुमावदार,
फरिया को फार शीश चूनरी चढ़ाऊँगी॥ [2]
कहत शहजादी ठाकुर कवी सों पैज कर,
वृन्दावन छोड़ अब कितहूँ न जाऊँगी। [3]
बांदी बनूँगी राधा-महारानी जू की,
तुर्किनी बहाय नाम गोपिका कहाऊँगी॥ [4]
- ताज बीबी
यह कविता मुस्लिम साम्राज्य की रानी ताज बेगम द्वारा तब रची गई, जब वे वृंदावन पहुंचीं और श्री बांके बिहारी लाल के दर्शन किए।
मैं अब अल्लाह, बिस्मिल्लाह, रहमान और रहीम का नाम छोड़ दूँगी और अब पीर और शहीदों की चर्चा भी नहीं करूँगी। [1]
अपना सूथना उतार कर, मैं घेरदार घाघरा पहनूँगी, अपने पुराने फरिया को फाड़ कर सिर पर चूनरी चढ़ाऊँगी। [2]
हूँ तो मैं शहजादी परंतु पूर्ण विश्वास के साथ कहती हूँ कि ‘अब वृंदावन को छोड़कर कहीं भी नहीं जाऊँगी।’ [3]
मैं श्री राधा महारानी जी की दासी बनूँगी, अपनी तुर्किनी नाम को मिटाकर गोपी के नाम से जानी जाऊँगी। [4]
अल्ला बिसमिल्ला रहिमान और रहीम छोड़,
पीर और शहीदों की चर्चा न चलाऊँगी। [1]
सूथना उतार पहिन घांघरा घुमावदार,
फरिया को फार शीश चूनरी चढ़ाऊँगी॥ [2]
कहत शहजादी ठाकुर कवी सों पैज कर,
वृन्दावन छोड़ अब कितहूँ न जाऊँगी। [3]
बांदी बनूँगी राधा-महारानी जू की,
तुर्किनी बहाय नाम गोपिका कहाऊँगी॥ [4]
- ताज बीबी
यह कविता मुस्लिम साम्राज्य की रानी ताज बेगम द्वारा तब रची गई, जब वे वृंदावन पहुंचीं और श्री बांके बिहारी लाल के दर्शन किए।
मैं अब अल्लाह, बिस्मिल्लाह, रहमान और रहीम का नाम छोड़ दूँगी और अब पीर और शहीदों की चर्चा भी नहीं करूँगी। [1]
अपना सूथना उतार कर, मैं घेरदार घाघरा पहनूँगी, अपने पुराने फरिया को फाड़ कर सिर पर चूनरी चढ़ाऊँगी। [2]
हूँ तो मैं शहजादी परंतु पूर्ण विश्वास के साथ कहती हूँ कि ‘अब वृंदावन को छोड़कर कहीं भी नहीं जाऊँगी।’ [3]
मैं श्री राधा महारानी जी की दासी बनूँगी, अपनी तुर्किनी नाम को मिटाकर गोपी के नाम से जानी जाऊँगी। [4]

