भ्रातर्यर्हि निमीलिताऽसि नयने - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.81)

भ्रातर्यर्हि निमीलिताऽसि नयने - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.81)

भ्रातर्यर्हि निमीलिताऽसि नयने तत्र क्व कान्तात्मज- भ्रातृ-स्वाप्त-सुहृद्गणाः क्व च गुणाः कुत्र प्रतिष्ठादयः।
कुत्राहंकृतयः प्रभुत्व-धनविद्याद्यैस्ततः सर्वत- स्त्वं निर्विद्य सविद्य! किं नु न चलस्यद्यैव वृन्दावनम्‌? ।।

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.81)

हे भ्रातः! जब तुम दोनों नेत्र बन्द करोगे (मृत्यु को प्राप्त होवोगे) तब तुम्हारे स्त्री, पुत्र, भ्राता एवं विश्वासपात्र सुहृदगण कहाँ रहेंगे? तुम्हारे गुण, तुम्हारी प्रतिष्ठा आदि किस काम आवेंगे? प्रभुता, धन एवं विद्या जनित जो अभिमान है, वह कहाँ रहेगा? इसलिये, हे सुविज्ञ! सबों से वैराग्य करके आज ही तू क्यों श्रीवृन्दावन नहीं चलता?