धनी धनी वृंदावन की धरनि - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (31)

धनी धनी वृंदावन की धरनि - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (31)

(राग कामोद)
“धनी धनी वृंदावन की धरनि।”
वृंदावन की भूमि धन्य धन्य है।

“अधिक कोटि बैकुंठ लोक ते,
सुक-नारद मुनि बरनि ।”

यहां की भूमि वैकुंठ धाम से भी अनंत कोटि श्रेष्ठ है, ऐसा शुकदेव नारद मुनि इत्यादि ने वर्णन किया है।

“राधा की छवि निरखत मोही,
नारायन की घरनि ।।”

यहां की अधीश्वरी देवी एक मात्र श्री राधा महारानी ही हैं, जिनकी रूप माधुरी से नारायण की पत्नी लक्ष्मी देवी भी मोहित हैं

“तहाँ 'व्यास' वसि ताप बुझायो,
अंतर हित की जरनि ।।”

विशाखा अवतार श्री हरिराम व्यास जी महाराज कहते हैं कि उनके मन की तपन इसी पावन भूमि में बसने से मिटी है ।
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (31)