कौनकूँख कीरति कीर्ति प्रकास देतो - श्री नागरीदास जी

कौनकूँख कीरति कीर्ति प्रकास देतो - श्री नागरीदास जी

(कवित्त)
कौनकूँख कीरति कीर्ति प्रकास देतो,
कौतुकी कन्हैया काज दूल्ही काहि कहते। [1]
दान दधि-घातिन में बृंदावन-बाटिन में,
काको दधि लूट प्रेम चित्त चाह चहते॥ [2]
नागरिया जोपे स्यामा स्वामिनी सलोनी बिनु,
कैसे घनस्याम रस-रास रंग लहते। [3]
आदि में न होती यदि राधे की रकार जोपै,
तोपै मेरे जान राधे बिन आधे कृष्ण रहते॥ [4]

- श्री नागरीदास जी

श्री राधा के बिना, माता श्री कीर्ति की कोख कैसे इतनी कीर्ति को प्राप्त कर सकती थी, और श्रीकृष्ण की प्रिय नित्य दुलहिनि किसे कहा जाता? [1]

श्री वृंदावन की संकरी गलियों में श्रीकृष्ण किसका दही चुराने का आनंद लेते? [2]

श्री नागरीदास कहते हैं, “श्री श्यामाजू के बिना, जो ब्रज की सुंदर महारानी हैं, श्रीकृष्ण, जो घनश्याम रूप हैं, महाप्रेम समुद्र के रस को कैसे पा सकते हैं?” [3]

यदि श्री राधा के नाम का पहला अक्षर ‘रा’ आपके नाम में न होता, तो हे श्रीकृष्ण, आप और आपका नाम केवल आधे ही रह जाते! [4]