[राग विहाग]
चाँपत चरन मोहनलाल।
पलंग पौढीं कँवरि राधे सुन्दरी व्रजवाल।।
कबहुँ कर गहि नैन लावत कबहुँ छुवावत भाल।
‘नंददास’ प्रभु छवि निहारत प्रीति के प्रति पाल।।
- श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली
श्रीकृष्ण वृंदावन में श्री राधिका जी के चरणों को दबा रहे हैं। ब्रज की प्यारी, नित्य किशोरी श्री राधा अपने शयन स्थान पर विराजमान हैं। कभी-कभी वे उन चरणों को नैनों से लगाते हैं और कभी माथे से । रसिक कवि श्री नंददास कहते हैं, "मैं प्रभु की यह छवि देख कर कह सकता हूँ प्रीति के वे ही केवल रक्षक और पालक हैं "।
चाँपत चरन मोहनलाल।
पलंग पौढीं कँवरि राधे सुन्दरी व्रजवाल।।
कबहुँ कर गहि नैन लावत कबहुँ छुवावत भाल।
‘नंददास’ प्रभु छवि निहारत प्रीति के प्रति पाल।।
- श्री नंददास, नंददास ग्रंथावली
श्रीकृष्ण वृंदावन में श्री राधिका जी के चरणों को दबा रहे हैं। ब्रज की प्यारी, नित्य किशोरी श्री राधा अपने शयन स्थान पर विराजमान हैं। कभी-कभी वे उन चरणों को नैनों से लगाते हैं और कभी माथे से । रसिक कवि श्री नंददास कहते हैं, "मैं प्रभु की यह छवि देख कर कह सकता हूँ प्रीति के वे ही केवल रक्षक और पालक हैं "।

