(कवित्त)
गति पै गयन्द वारौं पग अरविन्द वारौं,
हठी अलि वृन्दवारौं अलकन फंद पै। [1]
गुल्फ पे गुलिन्द वारौं शीलता पै सिन्धु वारौं,
सकल सुगन्ध वारौं मुखकी सुगन्ध पै॥ [2]
कटि पै मृगेन्द्र वारौं तन छवि वृन्द वारौं,
बेनी पै कनींद्र वारों जात नदनंद पै। [3]
ओठ जीव बन्धु वारौं हाँसी सुधा कन्द वारौं,
कोटि-कोटि चन्द्र वारौं श्री राधा मुख चन्द पै॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (98)
श्री हठीजी कहते हैं, “श्री राधा की गति पर गजेन्द्र को न्योछावर कर दूँ, उनके चरण कमलों पर कमल पुष्प न्योछावर कर दूँ, और उनकी घुंघराली काली अलकावली पर भ्रमर-वृंद न्योछावर कर दूँ।” [1]
फूलों का गुलदस्ता उनके चरण कमलों पर, महासागर को उनकी शीतलता पर, और उनके मुखकमल की सुगंध पर सृष्टि की सारी सुगंध न्योछावर कर दूँ! [2]
उनके कटिप्रदेश पर मृगराज को, सम्पूर्ण सुंदरता को उनके तन की छवि पर, और उनकी वेणी पर भुजंग सर्प को न्योछावर कर दूँ, जो नंदनंदन के प्राणों की संजीवनी हैं। [3]
उनके होठों पर बंधुजीव को, उनकी मुस्कुराहट पर अमृत को, और उनके मुखचन्द्र की छटा पर करोड़ों चंद्रमाओं को न्योछावर कर दूँ। [4]
गति पै गयन्द वारौं पग अरविन्द वारौं,
हठी अलि वृन्दवारौं अलकन फंद पै। [1]
गुल्फ पे गुलिन्द वारौं शीलता पै सिन्धु वारौं,
सकल सुगन्ध वारौं मुखकी सुगन्ध पै॥ [2]
कटि पै मृगेन्द्र वारौं तन छवि वृन्द वारौं,
बेनी पै कनींद्र वारों जात नदनंद पै। [3]
ओठ जीव बन्धु वारौं हाँसी सुधा कन्द वारौं,
कोटि-कोटि चन्द्र वारौं श्री राधा मुख चन्द पै॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (98)
श्री हठीजी कहते हैं, “श्री राधा की गति पर गजेन्द्र को न्योछावर कर दूँ, उनके चरण कमलों पर कमल पुष्प न्योछावर कर दूँ, और उनकी घुंघराली काली अलकावली पर भ्रमर-वृंद न्योछावर कर दूँ।” [1]
फूलों का गुलदस्ता उनके चरण कमलों पर, महासागर को उनकी शीतलता पर, और उनके मुखकमल की सुगंध पर सृष्टि की सारी सुगंध न्योछावर कर दूँ! [2]
उनके कटिप्रदेश पर मृगराज को, सम्पूर्ण सुंदरता को उनके तन की छवि पर, और उनकी वेणी पर भुजंग सर्प को न्योछावर कर दूँ, जो नंदनंदन के प्राणों की संजीवनी हैं। [3]
उनके होठों पर बंधुजीव को, उनकी मुस्कुराहट पर अमृत को, और उनके मुखचन्द्र की छटा पर करोड़ों चंद्रमाओं को न्योछावर कर दूँ। [4]

