यह दिव्य प्रसाद प्रिया पिय कौ।
रदसत ही मन मोद बढावत, परसत पाप हरत हिय कौ।।
पावत परम प्रेमम उपजावत, भुलवत भाव पुरुष तिय कौ।
भगवतरसिक भाँवत भूषन, तिहि छिन होत जुगल जिय कौ ।।
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (7)
भावार्थ: श्रीयुगल के प्रसार की महिमा का वर्णन करते हुए श्रीभगवत रसिकजी कहते हैं कि प्रिया प्रियतम का यह प्रसाद दिव्य है। नजर पड़ते ही, मन के आनंद को बढाने लगता है, स्पर्श करते ही हृदय के पापों को हर लेता है और ग्रहण करते ही विशुद्ध प्रेम उत्पन्न कर देता है। (केवल इतना ही नहीं) यह प्रसाद स्त्री अथवा पुरुष होने के भाव का विस्मरण कराकर साधक को तुरंत ही श्री युगल के हृदय मनभाया आभूषण (हार) बना देता है ।
रदसत ही मन मोद बढावत, परसत पाप हरत हिय कौ।।
पावत परम प्रेमम उपजावत, भुलवत भाव पुरुष तिय कौ।
भगवतरसिक भाँवत भूषन, तिहि छिन होत जुगल जिय कौ ।।
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (7)
भावार्थ: श्रीयुगल के प्रसार की महिमा का वर्णन करते हुए श्रीभगवत रसिकजी कहते हैं कि प्रिया प्रियतम का यह प्रसाद दिव्य है। नजर पड़ते ही, मन के आनंद को बढाने लगता है, स्पर्श करते ही हृदय के पापों को हर लेता है और ग्रहण करते ही विशुद्ध प्रेम उत्पन्न कर देता है। (केवल इतना ही नहीं) यह प्रसाद स्त्री अथवा पुरुष होने के भाव का विस्मरण कराकर साधक को तुरंत ही श्री युगल के हृदय मनभाया आभूषण (हार) बना देता है ।

