लुलित नव लवङ्गोदार कर्पूरपूरं-
प्रियतम-मुख-चन्द्रोदगीर्ण ताम्बूल-खण्डम् ।
घनपुलक कपोला स्वादयन्ती मदास्ये-
र्पयतु किमपि दासी-वत्सला कर्हि राधा।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (155)
कपूर की शीतलता के कारण जिनके कपोलों पर पुलक का उदय हो रहा है और जो अनिर्वचनीय रूप से दासी-वत्सला हैं। ऐसी श्रीराधा प्रियतम श्रीकृष्ण के मुख-चन्द्र द्वारा चर्वित नव-लवङ्ग-चूर्ण एवं प्रचुर कर्पूर-समन्वित ताम्बूल-खण्ड का आस्वादन करते-करते कब उस चर्वित ताम्बूल को मेरे मुख में अर्पण करेंगी ?
प्रियतम-मुख-चन्द्रोदगीर्ण ताम्बूल-खण्डम् ।
घनपुलक कपोला स्वादयन्ती मदास्ये-
र्पयतु किमपि दासी-वत्सला कर्हि राधा।।
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (155)
कपूर की शीतलता के कारण जिनके कपोलों पर पुलक का उदय हो रहा है और जो अनिर्वचनीय रूप से दासी-वत्सला हैं। ऐसी श्रीराधा प्रियतम श्रीकृष्ण के मुख-चन्द्र द्वारा चर्वित नव-लवङ्ग-चूर्ण एवं प्रचुर कर्पूर-समन्वित ताम्बूल-खण्ड का आस्वादन करते-करते कब उस चर्वित ताम्बूल को मेरे मुख में अर्पण करेंगी ?

