वृन्दावन बसि कष्ट जो होइ, कोटि मुक्ति सुख भुगतै सोइ - श्री रसिकदेवजी, श्री रसिकदेवजी की वाणी

वृन्दावन बसि कष्ट जो होइ, कोटि मुक्ति सुख भुगतै सोइ - श्री रसिकदेवजी, श्री रसिकदेवजी की वाणी

वृन्दावन बसि कष्ट जो होइ, कोटि मुक्ति सुख भुगतै सोइ ।
दुखी - सुखी वृन्दावन में मरे, जैसे सूर न रण ते टरे ।।

- श्री रसिकदेवजी, श्री रसिकदेवजी की वाणी

जो वृंदावन में बसता है, और उसे यदि कष्ट भी होता है तो भी फल स्वरूप उसे कोटि मुक्तियों की प्राप्ति से भी अधिक सुख प्राप्त होता है। जैसे वीर व्यक्ति युद्ध से पीछे नहीं हटते,एवं स्वयं शहीद हो जाते हैं, उसी प्रकार सुखी दुखी होकर कैसे भी वृंदावन त्याग कर उसी योद्धा की भांति कहीं नहीं जाना चाहिए और वृंदावन में ही प्राण त्यागने चाहिए।