नाहन्ता-ममते वृथा कुरु सखे - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.69)

नाहन्ता-ममते वृथा कुरु सखे - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.69)

नाहन्ता-ममते वृथा कुरु सखे! देहालय-स्त्रयादिके छित्त्वा दुर्जरश्रृखलं गुरुगिरा ते मोहमात्रोदितम्।
वृन्दारण्यमुपेत्य शीघ्रमखिलानन्दैकसाम्राज्यसत् कन्दं कन्दफलादि-वृत्तिरनिशं तन्नाथलीलां स्मर।।

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.69)

हे सखे! देह, गृह, स्त्री आदि में वृथा ‘अहं’ ‘मम’ बुद्धि न कर, मोह मात्र ही उत्पन्न करने वाले इन पाशों (जंजीरों) को गुरुवाक्यों द्वारा तोड़। समस्त साम्राज्य सुख के बीज स्वरूप श्री वृन्दावन में शीघ्र पहुँच कर कन्द फलादि द्वारा जीवन धारण करते हुए श्री वृन्दावन चन्द्र की लीला निरन्तर स्मरण कर।